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सभी अलवरवासियों को राम-राम। पिछले लगभग एक वर्ष से सोमवार का दिन आपसे संवाद का अवसर बन गया है। इस संवाद में मैं उन मुद्दों को केंद्र में रखने का प्रयास करता हूँ जो सीधे अलवर लोकसभा क्षेत्र की समृद्धि से जुड़े हुए हैं।
आपको यह बताते हुए खुशी हो रही है कि कल मैं चौथे भारत-जर्मनी पर्यावरण मंच में भारत का प्रतिनिधित्व करूँगा। भारत-जर्मन पर्यावरण मंच पर्यावरण नीति के क्षेत्र में भारत और जर्मनी के बीच सर्वोच्च स्तर का द्विपक्षीय मंच है, जिसका आयोजन वर्ष 2008 से किया जा रहा है। शायद आप सोच रहे होंगे कि यह बात अलवर के लिए खास क्यों है।
आपको यह जानकर खुशी होगी कि जर्मनी के पर्यावरण, प्रकृति संरक्षण, परमाणु सुरक्षा और जलवायु संरक्षण मंत्री कार्सटेन श्नाइडर इस फोरम में सम्मिलित होने से पहले सरिस्का पहुँचे थे। श्री श्नाइडर मात्र सरिस्का सफारी के लिए नहीं गए थे। अपनी टीम के साथ श्री श्नाइडर के सरिस्का जाने का प्रयोजन हमारे सरिस्का के बाघ पुनर्वास एवं जैव विविधता को समझना था। यह सरिस्का के संरक्षण और संवर्धन के लिए किए गए हमारे सामूहिक प्रयासों की वैश्विक स्वीकार्यता का प्रमाण है और अलवर के लिए गर्व का विषय है।
यह हमारे लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सरिस्का केवल अलवर की पहचान नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध प्राकृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरिस्का में बाघों की सफल पुनर्स्थापना से लेकर जैव विविधता के संरक्षण तक, अलवर ने यह दिखाया है कि विकास और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं। आज जब दुनिया जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता के संरक्षण जैसे विषयों पर समाधान खोज रही है, तब सरिस्का का अनुभव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा और सीख का विषय बन रहा है।
मेरे लिए यह गर्व का विषय है कि कल भारत-जर्मनी पर्यावरण मंच के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण पर वैश्विक विमर्श में भारत का पक्ष रखने का अवसर मिलेगा और इस अवसर पर अलवर की धरती, सरिस्का के जंगलों और हमारे संरक्षण प्रयासों की कहानी भी दुनिया के सामने रखने का प्रयास करूँगा।
अपने राजनैतिक जीवन में पहले सांसद और फिर मंत्री के रूप में काम करते हुए मैंने शासन की त्रिस्तरीय व्यवस्था को करीब से देखा है। पिछले 2.5 वर्षों में पंचायत से लेकर राज्य और राज्य से राष्ट्र तक की शासन व्यवस्था में काम करते हुए नीतियों और योजनाओं का क्रियान्वयन भी किया है और अवलोकन भी। राजस्थान तो देश का पहला राज्य था जिसने पंचायती राज की त्रिस्तरीय व्यवस्था को लागू किया।
इस व्यवस्था में काम करते हुए मैंने यह पाया है कि कई बार सही नीति भी जमीन पर वांछित नतीजे नहीं दे पाती। इस विफलता का एक बड़ा कारण क्षमता निर्माण (capacity building) का अभाव है।
स्वराज का सच्चा अर्थ तभी है, जब निर्णय लेने की शक्ति के साथ-साथ निर्णयों को प्रभावी ढंग से लागू करने की क्षमता भी स्थानीय संस्थाओं में हो। इसलिए क्षमता निर्माण, सशक्त स्थानीय स्वशासन की पहली आवश्यकता है। सत्ता का विकेंद्रीकरण स्वराज की शुरुआत है, लेकिन क्षमता का विकेंद्रीकरण ही स्वराज को सफल बनाता है। मैंने अपने अनुभवों से यह जाना और समझा है कि मजबूत निकाय केवल अधिकारों से नहीं बनते; उन्हें जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए आवश्यक ज्ञान, कौशल और संसाधनों से भी सक्षम बनाना पड़ता है।
हमारे देश में कृषि, डेयरी, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम, कोआपरेटिव, स्वदेशी चिकित्सा के स्तर पर अनेक क्षमताएं हैं। इन्हें एक 'प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त' जिसे हम competitive edge भी कहते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों से हो रहा पलायन आज एक बड़ी समस्या है। जब गांवों में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत सुविधाओं के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो युवा बेहतर भविष्य की तलाश में शहरों की ओर पलायन करते हैं। इससे एक ओर गांवों की सामाजिक और आर्थिक संरचना प्रभावित होती है, तो दूसरी ओर शहरों पर जनसंख्या और संसाधनों का अतिरिक्त दबाव बढ़ता है।
इस चुनौती का समाधान गांवों को केवल सुविधाओं से जोड़ने में नहीं, बल्कि उन्हें अवसरों का केंद्र बनाने में है। स्थानीय स्तर पर रोजगार, उद्यमिता और कौशल विकास के अवसर बढ़ाकर हम युवाओं को अपने गाँव और छोटे शहरों में ही सम्मानजनक आजीविका दे सकते हैं।
यही कारण है कि मैं अलवर लोकसभा क्षेत्र में अलवर सांसद खेल उत्सव के माध्यम से खेलों, ई-गुरुकुल के माध्यम से शिक्षा, सेल्फ हेल्प ग्रुप के माध्यम से महिलाओं और डेयरी के माध्यम से पशुपालकों एवं किसानों के लिए न केवल आय बल्कि क्षमता निर्माण पर लगातार बल दे रहा हूँ।
आने वाले समय में अलवर के गांवों, कस्बों और शहरों को और अधिक सक्षम, आत्मनिर्भर और विकसित बनाने की हमारी यात्रा को नई गति देने का अवसर है। यह यात्रा किसी एक व्यक्ति या संस्था की नहीं हो सकती। इसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी आवश्यक है। हमें ऐसे स्थानीय नेतृत्व और ऐसी संस्थाओं को मजबूत करना होगा, जो अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं को समझें, उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करें और विकास को अंतिम व्यक्ति तक पहुँचाने की क्षमता रखते हों।
आइए, हम सब मिलकर अपने गाँव, अपने कस्बे और अपने शहर को केवल सुविधाओं से संपन्न बनाने का नहीं, बल्कि क्षमता, अवसर और आत्मनिर्भरता से सशक्त बनाने का संकल्प लें। क्योंकि मजबूत स्थानीय संस्थाएं ही मजबूत समाज की नींव हैं और मजबूत समाज ही विकसित अलवर का आधार बनेगा।
आपका अपना
भूपेंद्र यादव